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अप्रैल, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
नमक की तरह ************ राज  करने के लिए किसी को नाराज़ करना जरूरी नहीं है जग जीतने के लिए जंग जीतने की बात करना निहायत  मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव है जरूरी नहीं कि हीरो की तरह हो इंट्री फिल्म खत्म होने के बाद गूंजा जा सकता है पार्श्व- संगीत की तरह उपस्थिति जब अनुभूति बन जाती है बढ़ जाता है जीने और जिमने का स्वाद बगैर किसी शोर-शराबे के घुला जा सकता है  किसी के जीवन में नमक की तरह।
कुछ विचार करो ************* कुछ गूंगे हैं कुछ बहरे हैं कुछ विष-वमन करते निरंतर कहीं अभिव्यक्ति पर भी पहरे हैं हे भारत माता! क्या गिनाऊं ज़ख्म कितने हैं जो गहरे हैं कुछ को पता नहीं, क्या बोल गए फिजाओं में विष घोल ग‌ए कुछ खूंटे में बंधे -बंधे भूल गए अपनी भाषा भी सच्चाई औ नैतिकता की परिभाषा भी कहां गया उदार चरित्र कहां ग‌ए उदात्त भाव कौड़ी के मोल में बिक रहे इतना भी तो नहीं अभाव ऊंचे सपने देखते-देखते हम कितने बौने हो ग‌ए यह मिट्टी ही है सब कुछ पगले! मत इसका तू तिरस्कार करो यह बची रहेगी,तभी बचोगे इसका भी विचार करो।
बौद्धिकता ********* कुछ लोग गाल बजा रहे थे कुछ ने साध ली थी चुप्पी एक बौद्धिक गुंगों की गोष्ठी में बौद्धिकता से आतंकित कर रहा था तभी रामजी बाबा जोर से चिल्लाए- "बड़ पढ़ुआ से बड़ भड़ुआ।"
बाधा- दौड़ ********* फरियादी और हाकिम के बीच महज टेबल भर का फासला था। मिलना बहुत जरूरी था वक्त की नजाकत को समझते हुए उसने बाधाओं को झेलने का मन बना लिया था कान सुनने के अभ्यस्त-अभिशप्त हो गये थे- साहब मीटिंग में बिजी हैं जरुरी काम से दौरे पर हैं संचिकाओं में डुबे हुए हैं आज मूड बहुत गरम है (ए.सी.में बैठने के बावजूद) और दरवाजे छेंक कर बैठा वह निजी सहायक पुरानी फिल्मों का क्रूर खलनायक! काफी जद्दोजहद के बाद कुछ पाबंदियां रखीं ग‌ईं कविताओं में बात नहीं रखनी है कार्यालय की भाषा का इस्तेमाल हो अनुरोध करें, शिकायत बिल्कुल नहीं नियम का हवाला दे नहीं सकते फरियादी दर्द से कराह रहा था उसकी आवाज गायब हो गई वह गिरते-गिरते बचा मुंसिफ की कुर्सी पर मुजरिम बैठा था।
रिंग मास्टर ********* शेर तब तक शेर है,जब तक जंगल में है सर्कस के पिंजरे में वह चूहे से भी कमजोर है जैसे ही खत्म होती है उसकी स्वच्छंदता वह अपनी चाल भूल जाता है बदल जाती है उसकी आवाज वह मात्र निर्देशों का पालन करता है पिंजर क्षमताओं का आकलन नहीं करता और इसका उपयोग तो कत‌ई नहीं वह तो शक्ति से मनोरंजन करता है लोग भी मनोरंजन करते हैं कोई आश्चर्य नहीं कि शेरों की संख्या कम होती जा रही हैं शायद और भी कम हो जायेंगी और बढ़ भी जाए तो क्या एक रिंग मास्टर अनेक शेरों को नचा सकता है अपने इशारों पर चिंता नहीं करो मित्रों! सर्कस  का खेल जारी रहेगा।
विस्मृति का सुख ******/****  मैं कुछ भी याद रखने के पक्ष में नहीं हूं यादें अंततः दुःख देती हैं किसी के द्वारा किया गया उपकार भी एक दिन हमें शर्मिन्दा करता है। मैं कृतघ्न नहीं हूं पर कृतज्ञता-ज्ञापन में संकोची हूं मुझे प्रदर्शन  की कला नहीं आती मैं उस पीढ़ी का आखिरी वंशज हूं जो औपचारिकता  पूरी करने के बजाय हृदय में किसी को बिठा लेते हैं। विस्मृति में अद्भुत सुख है किसी के द्वारा किया गया अपमान किसी के द्वारा लुटाया गया प्यार सब को भूल जाने से हम हल्का हो जाते हैं सफर में कितना ढोयेंगे बोझ सांसें उखड़ जाएंगी। मैं ईश्वर को कठघरे में खड़ा नहीं कर सकता पर इतना जरूर कहूंगा कि कुछ लोग गलत समय मैं पैदा हो जाते हैं। हे ईश्वर ! जरूरी समय फर जरुरी लोगों को जरूर भेजा जाए।
शो-केस के फूल ************ मुझे सजावटी मत कहो बनावटी तो बिल्कुल नहीं क्या हुआ, सुगंध नहीं है तो कांटे भी तो नहीं हैं मुझमें अपने अनोखे रंग और ताजगी से दे रहा हूं मात सबको और पूरी ठसक के साथ आसीन हूं साहब की मेज पर। अरे पगले गुलाब! पाले रहो राजा होने का गुमान कटते रहो, छंटते रहो पीते रहो आंसू,खाते रहो धूप सोते रहो कांटों की सेज पर तुम्हारा सौभाग्य कहां कि सज सको साहब की मेज पर। बड़े गौर से सुनने के बाद मुस्करा कर बोला गुलाब- अबे! शो-केस में कैद गुलाम यही तो तेरे और मेरे बीच फर्क है हे चिरायु!सजे रहो तू चिर काल तक पर मेरी क्षणभंगुरता का अपना तर्क है।
शब्द बार-बार लौटते हैं ---------------------------- जिन ध्वनियों को मुक्त कर देते हो अपने दिल को तसल्ली अपने को हल्का महसूस करते हो वे नहीं लौटते तुम्हारे पास। पर इनकी प्रतिध्वनियां गुंजती रहती हैं उन कानों में जिनके लिए करते हो इनका प्रयोग जिम्मेदार व्यक्तियों के शब्द तो उद्धृत होते हैं बार-बार कुछ शब्द तो दर्ज हो जाते हैं इतिहास में साक्षी है समय शब्द पुरस्कृत किये जाते हैं शब्द करते हैं मरहम का काम जो नहीं समझते शब्द का मर्म गाहे-बगाहे चलाते रहते हैं शब्दभेदी बाण भले ही वापस नहीं लौटे श्रवण कुमार पर उसके माता-पिता के कातर शब्दों की प्रतिध्वनियां गुंजती हैं जनमानस में बार-बार हो न जाए कोई अनर्थ, अनाचार इसलिए शब्दों को मुक्त करने के पहले कवि करता है बहुत सोच-विचार। ह
स्टेटस -------- बड़ी संजीदगी से सोच-विचार कर उसने डाला है अपना स्टेटस रहताा है हरदम  ऑनलाइन बार -बार देखता है उसे कितने लोगों ने उसे देखा मिला अगर लाइक तो सहसा उछल पड़ता है मानो उसकी खुशियों के शेयर में आ गया हो उछाल मालूम तो उसे भी है कि मात्र एक दिन की आयु है उसके पसंदीदा स्टेटस की स्टेटस कोई स्टेटस सिंबल नहीं है स्टेटस आज के समय में बहुत तेजी से बदलता है स्थायित्व कमजोरी की निशानी है आप कायम हैं अपने उसूलों पर यह आपकी निजी परेशानी है।
वाचाल समय ---------------- कहने को सब बेताब हैं श्रोताओं का अकाल है यह समय वाचाल है। इस कहने की आपाधापी में विवेक पीछे छूट गया है सोचने की शक्ति क्षीण हो गई है बुद्धि  मंद, कंगाल है। हर प्रश्न का त्वरित  जवाब है कौन परखे सत्य को और क्यों किसे है इतना धैर्य सबसे बड़ा यही सवाल है। सिर्फ बोलना ही मकसद है और प्रतिक्रिया देना भी जो चुप है उसका बुरा हाल है। मन आकुल- व्याकुल है सब उसे पसंद करें पर दूसरों की पसंद का किसे ख़्याल है। समझ में बात आने लगी है अब मौन भी एक साधना है ज्यादा बोलना बचपना है।
दुःख         ----------- दुःख हमारे सिर पर ठोकर मारने वाली चिड़िया है जो कहीं से उड़ कर आती है अचानक एक झटका देती है अकस्मात जब तक संभलते हैं हम वह फिर पहुंच जाती है हम उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं वह फुर्र से उड़ जाती है हम हैं कि कोशिश करते हैं बार-बार उड़ती हुई चिड़िया को पकड़ने की उसके चले जाने के बाद भी करते रहते हैं ठोकर की याद इस तरह हम दुःख को पकड़े रहते हैं जीवन भर दुःख से जकड़े रहते हैं।                                   ललन चतुर्वेदी
मन        ---                    ललन चतुर्वेदी चाहता है नाप लें पूरे गगन को फिर थोड़ी देर में थक जाता है कभी करने लगता किसी से बेशुमार प्रेम कभी घृणा से भर उठता है जिस द्वार से दुत्कार कर भगाया जाता है उसकी देहरी पर नाक रगड़ता है बार-बार कैसे कहा जाए कि यह मजबूत है सच है कितना मजबूर है ! नाचता रहता है परिस्थितियों की लय-ताल पर मन सचमुच नटवर है‌‌,मन पक्षी है उछल-कूद करता है डाल-डाल पर जरूरी है कि रखा जाए इसे संभाल कर कहते हैं विज्ञजन-                                          मन के हारे हार है मन के जीते जीत पर मन करता है हमें बार-बार भयभीत क्यों मन का नहीं होने पर होती है तकलीफ मन इतना नटखट है कि सुनता भी नहीं कभी सीख मन जीवन के चलचित्र का निर्देशक है जो किसी को हीरो, किसी को विलेन बनाता है। कोई ज्ञानी भी इसकी पटकथा समझ नहीं पाता है
बोल (कविता) ------------------ कितने अनमोल हैं वे बोल जो बोले गये सदियों पूर्व पर जीवित हैं आज भी कल भी जीवित रहेंगे जब तक धरा रहेगी गुंजते रहेंगे एक कान से दूसरे कान तक घोलते रहेंगे अमृत दिखलाते रहेंगे रास्ता बंधाते रहेंगे ढाढ़स टुटने नहीं देंगे धैर्य वे कैसे  उदार लोग  थे जिन्हें छू नहीं पायी यश- लिप्सा अपना लघु नाम तक नहीं जोड़ा अपने अनमोल पदों में कहीं भी सदियों पूर्व कुछ कहकर चले गए हम सुनते-सुनाते रहेंगे सदियों तक सच पूछो तो ऐसी रचनाएं ही कालजयी होती हैं जो युगों-युगों तक जलती रहती हैं मशाल की तरह रचना जब अतिक्रमण कर जाती है रचयिता का और करने लगती है लोक- जिह्वा की सवारी तब वह सुरसरि बन जाती है कवि और कविता में कोई भेद नहीं रह जाता।                                ललन चतुर्वेदी, बेंगलुरु              ====   =  25/12/2018=====
जिंदगी ***** माना कि कोई अदृश्य शक्ति करती   रहती  है   निर्देशन पर जिन्दगी की पटकथा खुद लिखता है इंसान व्यर्थ है किसी को दोष देना व्यर्थ है किये पर पछतावा लिख चुकने के बाद नहीं है मिटाने का विकल्प न ही है सिर धुनने का कोई लाभ दंड अवश्यसंभावी है उसका जो  किया जा चुका अपराध होम करते हुए भी जला करता है हाथ खड़े हो थामकर मजबूती से जिस प्रिय का हाथ अचरज नहीं ऐन वक्त पर चल दे वह भी झटककर हाथ उठा करता है  पूनम को देखकर विशाल उदधि में जो ज्वार क्षण भर में ही हो जाता उसका अवसान हर सृजन के  पार्श्व में पांव दबाये टहलता रहता है दुःख दुर्दिन में आ खड़ा होता है सम्मुख जीवन घात -प्रतिघात का संघात लगता है सब कुछ आकस्मिक-अकस्मात सुख स्वप्न है, दुःख है सत्य कब समझा यह नर मर्त्य कितना सही लिखा महादेवी ने-  जीवन है विरह का जलजात l                ललन चतुर्वेदी, बेंगलुरु।
जीवन्त जीवन जन्मऔर मृत्यु के दो छोरों तक नहीं सिमटा होता है जीवन पिता के नाम से जाना जाता है पुत्र और पुत्र के नाम से भी कभी-कभी पहचाने जाते हैं पिता-पितामह कभी -  कभी जीवन लांघ जाता है सदियों का अछोर विस्तार जीवन का अर्थ शतायु होना नहीं है यह तो बंध जाना है सीमाओं में जीवन तब सफल होता है जब कर देता है मृत्यु का अतिक्रमण असंख्य लोग आते हैं दुनिया में अपना जीवन जी कर चले जाते हैं सच है ऐसे लोग मर जाते हैं जब भी कोई किसी के जाने के बाद करे पूरी शिद्दत से याद और यह याद ला सके किसी की आंखों में आंसू आप फिर से जी उठते हैं यकीन मानिए इस नश्वर काया के नष्ट हो जाने के बाद मनुष्य जीवित रहता है अपने विचारों में ऐसे लोग झुठला देते हैं मनुष्य के मरणशील होने का मुहावरा।                                 -        ललन चतुर्वेदी
नमक की तरह ************ राज  करने के लिए किसी को नाराज़ करना जरूरी नहीं है जग जीतने के लिए जंग जीतने की बात करना निहायत  मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव है जरूरी नहीं कि हीरो की तरह हो इंट्री फिल्म खत्म होने के बाद गूंजा जा सकता है पार्श्व- संगीत की तरह उपस्थिति जब अनुभूति बन जाती है बढ़ जाता है जीने और जिमने का स्वाद बगैर किसी शोर-शराबे के घुला जा सकता है  किसी के जीवन में नमक की तरह।
हम गुगल के अग्रज हैं ***************** अब बच्चे सवाल नहीं करते बड़े- बुजुर्ग भी उनसे सवाल नहीं पूछते अलबत्ता, जवाब सबके पास है गजब का आत्मविश्वास है! कौन कहता है कि दुनिया में मुफ़्त में कुछ भी नहीं मिलता आओ,सखे! इस उदार देश में हम हर मुद्दे पर नि: शुल्क राय देते हैं दुनिया कायल है हमारी बुद्धिमत्ता की अगर मालूम हो दीवारों को पढ़ने  की कला आप पा सकते हैं जटिल समस्याओं का समाधान यहां गठिया का रोगी विज्ञापन देखकर दौड़ने लगता है मात्र पन्द्रह दिनों की ब्युटी टिप्स से पन्द्रह साल छोटी दिखने लगती है पत्नी कंचन काया से लौट जाती है पूरे घर की रौनक एक काॅल में ही दिख जाता है भविष्य इसीलिए हम हैं बिंदास, निर्भय वैसे राय देना हमारी पुरातन परंपरा है आजकल हम और आगे बढ़ गये हैं अब हम अपनी राय मनवाते भी हैं हम रायबहादुर के सच्चे वंशज हैं यकीन मानिए,हम ही गुगल के अग्रज हैं।
पिता रोए नहीं कभी **************** जिनकी छत्र-छाया में पल रहे थे पांच बहनें,दो भाई और बूढ़ी मां पिता ऐसे छतनार पेड़ थे। थी पड़ोसियों की स्वार्थी मंडली शामिल थे गांव-जवार के लोग दोस्त से लेकर दुश्मन भी कई जिन्हें अलगाना मुश्किल था। जरुरत के हिसाब से सेठ-साहूकार को भी साथ लेना जरूरी था मौका-मुनासिब ये काम आते थे पिता देर-सवेर जिनके कर्ज चुकाते थे करते थे ये कड़ा तगादा पर पिता के सामने नरम पड़ जाते थे इनके तेवर एकाध कप चाय पीकर और दो-तीन बार खाकर खैनी अगले महीने बकाया पा लेने के आश्वासन के साथ लौट जाते थे खुशी- खुशी। पिता को मालूम था कैसे कठोर लोगों से निबटा जाता है कैसे काटा जाता है फाकाकशी के दिन कैसे काटी जाती हैं टपकती हुई झोंपड़ी में सावन-भादो की काली रातें वक्त की नजाकत के मुताबिक किससे कैसे की जाती हैं बातें। पिता हर वार के कवच थे पिता उम्मीद की किरण थे पिता खाली थे, फिर भी भरे-पूरे थे पिता की अनुपस्थिति में हम सब होते अधूरे थे। पिता पूरा समय दोस्त-दुश्मन सबके करीब रहे कभी किसी को पता नहीं चला कब अमीर रहे,कब गरीब रहे पिता पूरा जीवन कर्ज...
अपना ख्याल रखियेगा ---------------------------- बहुत अजीब लगता है तब और भी जब अपने कहते हैं- अपना ख्याल रखियेगा। अक्सर मोबाइल पर आधुनिक बच्चे यह सलाह देना नहीं भूलते जो वर्षों से प्रवास पर होते हैं जिनकी प्रतीक्षा में पथरा जाती हैं मां-पिता की व्याकुल आंखें प्रेमिकाओं की मजबूरी फिर भी समझ में आती है पर क्या कहूं पत्नियों के बारे में जो अपना फर्ज निभाने में नहीं चूकतीं- अपना ख्याल रखियेगा बहुत आसान है कहना- ख्याल रखियेगा पर कितना कठिन है अपना ख्याल रखना अपनों के दूर रहने पर केवल अपने ही ख्याल आते हैं आदमी अपना ख्याल नहीं रख पाता ज़िन्दगी इतनी औपचारिक हो जाएगी- इसका हरगिज अनुमान नहीं था इतने भावशून्य  होते हैं रिश्ते! इतने गणितीय होते हैं संबंध! मानो दो पक्षों के बीच हो कोई अनुबंध अगर सेवा- शर्तों में हुई थोड़ी सी चूक टूट जायेंगे सारे बंधन अटूट नेह-नाता में भी नहीं रही मिठास कैसा समय का यह क्रूर अट्टहास रिश्तों ने इस तरह छला है कि - विश्वास पक्का हो चला है अपना ख्याल रखने में ही भला है।                 ...
यह क्या ****** इन दिनों मैंने पहन लिये हैं दूसरे के कपड़े लोग कहते हैं-  अच्छे लग रहे हो कहां से खरीदी, कहां से सिलवाई मेरे पास कोई जवाब नहीं कपड़े देने वाला हरदम मेरे साथ रहता है मैं अक्सर मौन रहता हूं इन दिनों। चलो,रात होने को है मैंने कपड़े उतार कर टांग दिये हैं खूंटी में बड़ी राहत मिली है आज अच्छी नींद आएगी।
दुनिया डिजिटल है *************** कौड़ी,आना,पाई सबका हिसाब रखते थे भाई पैसे के हिसाब-किताब से नाखुश भाइयों ने कर लिया बंटवारा चंद रुपये के लिए टूट गयी बरसों की दोस्ती पैसों के खेल में मगन लोगों को देखकर कबीर ने दुनिया को घोषित कर दिया बाजार। कैशबैक के चक्कर में हमने मोबाइल में लोड कर रखे हैं अनेक एप्प। आॅफर तय करते हैं क्या खाना है मुझे आज क्या पहनना है कल और पढ़ना भी क्या है हद है ,यकीन मानिए भाई साहब! बाल्टी के लोभ में प्रोफेसर साहब ने बदल दिया है अपना पसंदीदा अखबार अब पेपर पढ़ने के बजाय लोग कुपन काटकर जमा करने लगे हैं। बगल के कमरे में आसीन श्रीमती जी से श्रीमान कर रहे हैं ह्वाट्सएप पर संवाद आ रहे हैं संबंधों के नित नए डिजिटल संस्करण और कितने दूं उदाहरण और रखूं कितने उद्धहरण इस तरह हो रहा है सभ्यताओं का चीरहरण गाल पर दोनों हाथ रख कर घण्टे भर से सोच रही है मुनिया इतनी डिजिटल क्यों हो गयी दुनिया?                                             ...
भूख का बाजार ************ भूखा आदमी भूख की चर्चा नहीं करता सार्वजनिक नहीं करता  इस निजी दुःख को अपनी भूख मिटाने के लिए कभी अनशन पर नहीं बैठता भूख की तरह बचाता है आखिरी सांस तक आत्म सम्मान को। उसे बड़ा दुःख होता है जब सभ्य लोग भूख पर सेमिनार करते हैं खाए पिए अघाए लोग भूख को स्वादिष्ट व्यंजन की तरह परोसते हैं वह जानता है भूख का भी एक बड़ा बाजार है भूख सियासी युद्ध का एक हथियार है भले ही किसी की जान निकल जाए भूख से पर भूख किसी शातिर के लिए रोजगार है यह कितनी बड़ी विडंबना है कि भूख पर उसकी बात कभी नहीं सुनी जाती जिसे बात करने का सर्वाधिकार है।
चश्मा ललाट पर मत चढाइएगा ************************ वह बच्चा ही है जो सफेद को सफेद और स्याह को स्याह कहता है बचकानी हरकत किसी मूर्ख का गढ़ा हुआ मुहावरा है उम्र और अनुभव के बढ़ने के साथ-साथ नज़रें कमजोर हो जाती हैं कमजोर नजरें बहुत गुनहगार होती हैं बदल देती हैं नजरिया जरुरी है कि समय-समय पर नज़रों की जांच कराई जाएं हो सकता है नजदीकी ठीक हो मगर दूरी दुरुस्त नहीं हो कहीं सीढ़ियों से मंजिल पहुंचने के बजाय पहुंच न जाएं अस्पताल यह भी तो हो सकता है कि आप हों वर्णांधता के शिकार हालांकि मैं नजर का डाक्टर नहीं हूं और न ही मांग रहा हूं कोई नजराना एक नेक सलाह पर गौर फरमाइएगा चश्मे को ललाट पर मत लटकाएगा।
बिना पूंजी के रोजगार ***************** आलीशान, ऊंचे महल में चींटियां  छिद्र ढूंढ़ती हैं एक नौसिखुआ आलोचक उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है कोई कुटिल,कुपाठी हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला नखों से नाव में छेद बनाता है कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर आकाश पर जोर से थूकता है बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
कुत्ते **** (एक) कुत्ते हैं भौंकेंगे ही बात- बेबात चौकेंगे ही। (दो) ज़रुरत मुताबिक पूंछ हिलाते हैं वक्त की नजाकत देख दुम दबा निकल जाते हैं वफादार ही नहीं बुद्धिमान भी होते हैं कुत्ते (तीन) कुत्ते नहीं चाहते कि उनकी ही तरह कुछ और पैदा हों कुत्ते यदि हों भी तो मत आए उनकी सरहद में देखते नहीं हो पूरी ताकत लगा कर देते हैं तरी पार दूसरे कुत्ते को। (चार) कुत्ते आप से उतना ही प्रेम करते हैं जितना प्रेम वे आपसे पाते हैं बड़ा सटीक होता है उनका गणित मामूली आदमी के वश में नहीं किसी कुत्ते का प्रेम पाना मामूली आदमी में हिम्मत नहीं किसी कुत्ते से बैर करना भी। (पांच) नस्लों की विविधता में इनका कोई सानी नहीं किसी देश-काल, जलवायु में इन्हें कोई परेशानी नहीं मालूम हो जिसे अनुकूलन की कला क्या बिगाड़ सका है कोई उसका भला? (छ:) धनी, गरीब, सेठ-साहूकार मूर्ख, विद्वान , यहां तक कि खानाबदोश भी सब पालना चाहते हैं कुत्ते और अपनी- अपनी औकात के मुताबिक बाकायदा पालते भी हैं कुत्ते जरूरतों में क्यों शामिल हैं यह एक जरूरी सवाल है। (सात) बाघों की संख्या कम हो रही ह...
यह उदास होने का समय नहीं है --------------------------------------- एक नायिका की तस्वीर को हजारों लोग 'लाइक 'कर चुके हैं तरह- तरह के इमोजी चस्पा हो चुके हैं। एक निहायत भद्दा  पोस्ट पर कमेंट का रुक नहीं रहा है सिलसिला शेयर किया जा रहा है लगातार। एक बौद्धिक शख्स शरीफों को रोज गालियां बककर सुर्खियां बटोर रहा है। और कुछ लोग बौद्धिक जुगाली में व्यस्त हैं अति उत्साह में हैं कि अपने विचारों से बदल देंगे दुनिया। कुछ लोग आज भी इस आभासी दुनिया से बाहर सौन्दर्य की तलाश कर रहे हैं उनका मानना है कि धीरे-धीरे लोग लौट जायेंगे सही रास्ते पर आमने-सामने एक-दूसरे को देखकर मुस्करायेगे और गले मिलेंगे। किताब की दुकानों में रौनक लौटेगी खरीदेंगे लोग  किताबों के साथ जिल्द पढ़ेंगे और रखेंगे सुरक्षित बच्चों के लिए भी फिर से लोग सुनेंगे महेन्द्र मिश्र के गीत फिर से प्रकट होंगे भिखारी ठाकुर इतिहास स्वयं को दोहराता है क्यों निराश हुआ जाए कविते!अभी उदास होने का समय नहीं है।
फकीर की खुशी (कविता) सांसें उधार मिली हैं पर संस्कार अपने हैं पढ़ा हूं डिबिया की धुंधली रोशनी में लेकिन दृष्टि अमल- धवल है नंगे पांव तय किए हैं अनेक सफर जेठ की तपती दुपहरी में पर भूलकर भी नहीं चाहा कि कभी पहन लूं वुडलैंड  के जूते या सफर करूं वातानुकूलित   वाहन में बहुत इतराते हैं जो अपनी गगनचुंबी इमारतों पर उन्हें कभी मुयस्सर नहीं होगा किसी कुटिया का सुख-संतोष जब-जब याद आती है अपनी गर्वीली गरीबी आनंदविभोर हो जाता है मन मित्रों!एक फकीर की खुशी से वजीर की खुशी की तुलना मत करना।                           ललन चतुर्वेदी           
प्रेम-मरीचिका ********* आंखें धुंधला गई हैं पढ़ कर गुड मॉर्निंग,गुड नाईट के संदेश जो  जानते हैं मेरे अंतर्मन का हाल वे भी कहां चूकते हैं उनके ऐसे संदेश गहरे तक चुभते हैं क्या करेंगे ऐसे समय में लेकर प्यार जब बन चुकी है पूरी दुनिया बाजार क्या अर्थ रह गया है प्रेम का क्या मतलब रह गया है किसी के कुशल-क्षेम का पास में पैसे हों तो सब सगे दिखते हैं मतलब के रंग में सब रंगे दिखते हैं आपकी खुशियों से किसको लेना-देना पैसे हैं तो सब मीठे बोलते हैं सब के सब सिर्फ जेब टटोलते हैं छूंछा को जग में किसने पूछा सदियों से संत करते रहे हैं आगाह पर मदमस्त मन कब  करता है परवाह उसे जो दिखता है आस-पास कर लेता है सहज विश्वास खाता है खूब ठोकर फिर भी बना रहता है जोकर खुशियों को गिरवी रख देता है फिर करता है खुशियों की तलाश यही काम तो सारी उमर करता है इसी तरह सफर पूरी करता है जिसकी चिंता में घुलता रहता है वही उसको धुनता रहता है लेकिन नहीं छूटता है प्रेम का अवांछित रोग कोई समझ नहीं सका आज तक जीवन और मृग मरीचिका का संयोग।
ईश्वर की डायरी              -----    ---   ----- मन बड़ा अलसाया रहता है सुबह-सुबह बजाने लगते हो मेरे घर की घंटियां जोर-जोर से चैन से कभी सोने भी नहीं देते सिर के ऊपर लटका देते हो छिद्रदार घड़ा दिन-रात टपकता रहता है  बूंद-बूंद जल कितना असहज रहता हूं हर पल घर के मुंडेर पर बांध रखे हो लाउडस्पीकर कर्णभेदी आवाज से बधिर हो चुका हूं पड़ोसी बनाने लगे हैं घर खाली करने का दबाव मेरा नहीं तो कम से कम मेरे पड़ोसियों का और उन रुग्ण मनुष्यों का रखते खयाल हो चुका है मेरा ,उनका ,सबका बुरा  हाल कभी परवाह भी की तूने मेरे भूख-प्यास की रोज रख देते हो चम्मच भर मिसरी की कटिंग्स बिगड़ चुका है मेरे  मुंह  का स्वाद बहुत खुश होता हूं जब कभी बुलाते हो घर कहते हो यहां बैठो, यहां ठहरो उतरने भी नहीं पाती यात्रा की थकान कि तुम मुझे सुना देते हो जाने का फरमान ऐसा स्वागत नहीं देखा मैंने श्रीमान भारी मन से लौटता हूं फिर अपने घर फिर वही दिनचर्या हर पल,हर प्रहर कब बदलेंगे मेरे हालात मान्यवर? करता हूं अब पुष्पांजलि...
कविता इस बस्ती में मेरी क्या हस्ती है *********************** अमीरों ने जीना मुहाल कर दिया है एक-एक कर सारी बस्ती को कंगाल कर दिया है यह उसके कुते के भौंकने की आवाज से भंग हो रही है मेरे कविता की लय सड़कों पर श्वान को टहलाने निकल पड़ी है सुंदरी और होने लगा है मुझे भय मैंने टहलना स्थगित कर दिया है जब तक दासियां उसके घरों को धोयेंगी और बनायेंगी मुख्य- द्वार पर रंगोली तब तक श्वान सड़क पर नित्य क्रिया से निबट लेंगे सचमुच बड़ी सहनशील होती हैं सड़कें बिल्कुल गरीब आदमी की तरह।  यह मंदिर का पुजारी अहले सुबह रोज अपने को सबसे बड़ा भक्त  घोषित करता है मेरी बीमार देह के साथ-साथ कराह उठती है आत्मा   यह पड़ोसी तो जन्म-  जन्म का है प्यासा अपने शक्तिशाली मोटर से सोख लेता है कावेरी का पूरा जल मैं अपने भलेमानस होने का क्या प्रमाण दूं और आप क्यों विश्वास करेंगे फ़िक्र मत करे कोई मेरी मैं जानता हूं  इस बस्ती में रहने की मेरी हस्ती नहीं है।

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कविता-३, इस बस्ती में मेरी क्या हस्ती है ******* अमीरों ने जीना मुहाल कर दिया है एक-एक कर सारी बस्ती को कंगाल कर दिया है यह उसके कुते के भौंकने की आवाज से भंग हो रही है मेरे कविता की लय सड़कों पर श्वान को टहलाने निकल पड़ी है सुंदरी और होने लगा है मुझे भय मैंने टहलना स्थगित कर दिया है जब तक दासियां उसके घरों को धोयेंगी और बनायेंगी मुख्य- द्वार पर रंगोली तब तक श्वान सड़क पर नित्य क्रिया से निबट लेंगे सचमुच बड़ी सहनशील होती हैं सड़कें बिल्कुल गरीब आदमी की तरह।  यह मंदिर का पुजारी अहले सुबह रोज अपने को सबसे बड़ा भक्त  घोषित करता है मेरी बीमार देह के साथ-साथ कराह उठती है आत्मा   यह पड़ोसी तो जन्म-  जन्म का है प्यासा अपने शक्तिशाली मोटर से सोख लेता है कावेरी का पूरा जल मैं अपने भलेमानस होने का क्या प्रमाण दूं और आप क्यों विश्वास करेंगे फ़िक्र मत करे कोई मेरी मैं जानता हूं  इस बस्ती में रहने की मेरी हस्ती नहीं है।

मैं ऐसे समय में इस प्लेटफार्म पर उपस्थित हो रहा हूं,जब पूरा विश्व कोरोना वायरस से त्रस्त है।सबकी आशा भरी निगाहें भारत पर टिकी हुई है।महामारी संकट अपनी जगह है लेकिन एक और संकट जो सदियों से है और आपदा में यह और गहरा जाता है,वह है - सत्य नहीं बौलने का संकट। सत्य नहीं बोलना-असत्य को शीश झुकाकर स्वीकार करना है। निश्चित रूप से अभिव्यक्ति के खतरे हैं और हर युग में रहे हैं लेकिन हमें खतरा मोल लेना होगा। बुद्धिजीवी जन का मौन सालता है।इसी प्रकार अर्ध सत्य भी बड़ा खतरनाक होता है। हम इस मंच पर अपनी कविताओं एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों के साथ उपस्थित होते रहेंगे।भूल - त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा याचना सहित दो कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं--

तीन आदमी ********* एक आदमी इस धरती का वंदन करता है धूल से चन्दन करता है दूसरा आदमी अपनी हरकतों से कब चूकता है इस धरती पर थूकता है एक तीसरा आदमी भी है जो इसी थूक से अपना सत्तू सानता  है उसे कौन नहीं जानता है? ********************* रिसर्च-2019 ********** जो पढ़ा जहां तक पढ़ा सब सच पढ़ा जब बोला जहां भी बोला सब झूठ बोला पढने - लिखने का सही मतलब समझा समझा बुरा-भला अपने तमाम शोधों से यही निष्कर्ष निकाला सच बोलना -बुरी बला झूठ बोलना -ललित कला झुठ बोलना   -एक प्रतिभा कौन पूजित,कौन समादृत- झूठ की आदमकद प्रतिमा।