सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं
फकीर की खुशी (कविता)

सांसें उधार मिली हैं
पर संस्कार अपने हैं
पढ़ा हूं डिबिया की धुंधली रोशनी में
लेकिन दृष्टि अमल- धवल है
नंगे पांव तय किए हैं अनेक सफर
जेठ की तपती दुपहरी में
पर भूलकर भी नहीं चाहा कि
कभी पहन लूं वुडलैंड  के जूते
या सफर करूं वातानुकूलित   वाहन में
बहुत इतराते हैं जो
अपनी गगनचुंबी इमारतों पर
उन्हें कभी मुयस्सर नहीं होगा
किसी कुटिया का सुख-संतोष
जब-जब याद आती है
अपनी गर्वीली गरीबी
आनंदविभोर हो जाता है मन
मित्रों!एक फकीर की खुशी से
वजीर की खुशी की तुलना मत करना।
                          ललन चतुर्वेदी
          

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हमें समझ जाना चाहिए था  -------------------------------- इच्छा थी कि दो क़दम आगे बढ़कर करूं स्वागत  पर वे अनदेखा कर बगल से निकल ग‌ए मैंने उनकी व्यस्तता समझी  वे चले गए और मैं उन्हें रोज याद करता रहा मैंने उन्हें चिट्ठियां लिखी  संदेश भेजा मैसेंजर पर  सोचा, ह्वाट्सएप से भेजकर देखूं  वह भी किया  सब कुछ लाजवाब रहा  बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा  वे तो बड़े अच्छे आदमी हैं  मामूली लोगों के लिए खूब लिखते हैं  फिर एक मामूली आदमी कैसे रह गया अलक्षित  मुझे तो बहुत पहले समझ जाना चाहिए था मामूली आदमी के लिए लिखने वाले  मामूली आदमी की लड़ाई कभी नहीं लड़ते  सचमुच वे कोई मामूली आदमी नहीं है  यह हमें बहुत पहले समझ जाना चाहिए था। @ ललन चतुर्वेदी
बिना पूंजी के रोजगार ***************** आलीशान, ऊंचे महल में चींटियां  छिद्र ढूंढ़ती हैं एक नौसिखुआ आलोचक उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है कोई कुटिल,कुपाठी हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला नखों से नाव में छेद बनाता है कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर आकाश पर जोर से थूकता है बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
बात जो सबसे जरुरी है ****************** कुछ बातें पूछी नहीं जातीं कुछ बातें कही नहीं जाती सिर्फ महसूस की जाती हैं जरा सा भी चूक हुई  कि नष्ट हो जाती है मर्यादा मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता इसलिए जो बात पूछी न जाए उसे जरूर पूरी की जाए और जो बात कही न जाए उसे ध्यान से सुना जाए ध्यान रहे जो बातें सबसे जरुरी होती हैं उन्हें कहना-सुनना जरूरी नहीं होता।