फकीर की खुशी (कविता)
सांसें उधार मिली हैं
पर संस्कार अपने हैं
पढ़ा हूं डिबिया की धुंधली रोशनी में
लेकिन दृष्टि अमल- धवल है
नंगे पांव तय किए हैं अनेक सफर
जेठ की तपती दुपहरी में
पर भूलकर भी नहीं चाहा कि
कभी पहन लूं वुडलैंड के जूते
या सफर करूं वातानुकूलित वाहन में
बहुत इतराते हैं जो
अपनी गगनचुंबी इमारतों पर
उन्हें कभी मुयस्सर नहीं होगा
किसी कुटिया का सुख-संतोष
जब-जब याद आती है
अपनी गर्वीली गरीबी
आनंदविभोर हो जाता है मन
मित्रों!एक फकीर की खुशी से
वजीर की खुशी की तुलना मत करना।
ललन चतुर्वेदी
सांसें उधार मिली हैं
पर संस्कार अपने हैं
पढ़ा हूं डिबिया की धुंधली रोशनी में
लेकिन दृष्टि अमल- धवल है
नंगे पांव तय किए हैं अनेक सफर
जेठ की तपती दुपहरी में
पर भूलकर भी नहीं चाहा कि
कभी पहन लूं वुडलैंड के जूते
या सफर करूं वातानुकूलित वाहन में
बहुत इतराते हैं जो
अपनी गगनचुंबी इमारतों पर
उन्हें कभी मुयस्सर नहीं होगा
किसी कुटिया का सुख-संतोष
जब-जब याद आती है
अपनी गर्वीली गरीबी
आनंदविभोर हो जाता है मन
मित्रों!एक फकीर की खुशी से
वजीर की खुशी की तुलना मत करना।
ललन चतुर्वेदी
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