बिना पूंजी के रोजगार
*****************
आलीशान, ऊंचे महल में
चींटियां छिद्र ढूंढ़ती हैं
एक नौसिखुआ आलोचक
उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है
कोई कुटिल,कुपाठी
हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है
नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला
नखों से नाव में छेद बनाता है
कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर
आकाश पर जोर से थूकता है
बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां
मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
*****************
आलीशान, ऊंचे महल में
चींटियां छिद्र ढूंढ़ती हैं
एक नौसिखुआ आलोचक
उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है
कोई कुटिल,कुपाठी
हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है
नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला
नखों से नाव में छेद बनाता है
कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर
आकाश पर जोर से थूकता है
बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां
मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें