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संदेश

हमें समझ जाना चाहिए था  -------------------------------- इच्छा थी कि दो क़दम आगे बढ़कर करूं स्वागत  पर वे अनदेखा कर बगल से निकल ग‌ए मैंने उनकी व्यस्तता समझी  वे चले गए और मैं उन्हें रोज याद करता रहा मैंने उन्हें चिट्ठियां लिखी  संदेश भेजा मैसेंजर पर  सोचा, ह्वाट्सएप से भेजकर देखूं  वह भी किया  सब कुछ लाजवाब रहा  बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा  वे तो बड़े अच्छे आदमी हैं  मामूली लोगों के लिए खूब लिखते हैं  फिर एक मामूली आदमी कैसे रह गया अलक्षित  मुझे तो बहुत पहले समझ जाना चाहिए था मामूली आदमी के लिए लिखने वाले  मामूली आदमी की लड़ाई कभी नहीं लड़ते  सचमुच वे कोई मामूली आदमी नहीं है  यह हमें बहुत पहले समझ जाना चाहिए था। @ ललन चतुर्वेदी
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बात जो सबसे जरुरी है ****************** कुछ बातें पूछी नहीं जातीं कुछ बातें कही नहीं जाती सिर्फ महसूस की जाती हैं जरा सा भी चूक हुई  कि नष्ट हो जाती है मर्यादा मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता इसलिए जो बात पूछी न जाए उसे जरूर पूरी की जाए और जो बात कही न जाए उसे ध्यान से सुना जाए ध्यान रहे जो बातें सबसे जरुरी होती हैं उन्हें कहना-सुनना जरूरी नहीं होता।
इतनी शक्ति हमें देना दाता...! ********************** इन दिनों दर्द की कोई दवा नहीं अलबत्ता  दवा के लिए दर्द है निंदा और स्तुति में क्या फर्क है? कब कौन क्या बोल दे और सब हो जाएं चुप केवल देखें एक-दूसरे का मुंह सब अपने-अपने अंधेरे में दीपक जलाए बैठे हैं नदी का पानी गंदला हो गया है लेकिन सब घाटों ने बदल डाले हैं  अपने नाम कहने लगे हैं स्वयं को हरिश्चंद्र घाट मालूम नहीं कब मृतात्माओं को अदालत में पेश होने का हो जाए समन घर -वापसी की अनिश्चितता में ठिठकने लगा है पहला कदम मनुष्यत्व का कोई मार्ग सुरक्षित नहीं अचानक भीड़ बदल जाती है भेड़िये की शक्ल में प्रार्थना में उठे हाथ हवा में लटक जाते हैं धरती रक्त रंजित हो जाती है लुढ़क जाती है एक और लाश अस्पताल के बाहर भी चलता रहता है अंत्य परीक्षण क‌ई- क‌ई दिनों तक और हम एक बार फिर खडे हो जाते हैं उपासना गृह में गुनगुनाने लगते हैं- इतनी शक्ति हमें देना दाता.......!
नमक की तरह ************ राज  करने के लिए किसी को नाराज़ करना जरूरी नहीं है जग जीतने के लिए जंग जीतने की बात करना निहायत  मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव है जरूरी नहीं कि हीरो की तरह हो इंट्री फिल्म खत्म होने के बाद गूंजा जा सकता है पार्श्व- संगीत की तरह उपस्थिति जब अनुभूति बन जाती है बढ़ जाता है जीने और जिमने का स्वाद बगैर किसी शोर-शराबे के घुला जा सकता है  किसी के जीवन में नमक की तरह।
कुछ विचार करो ************* कुछ गूंगे हैं कुछ बहरे हैं कुछ विष-वमन करते निरंतर कहीं अभिव्यक्ति पर भी पहरे हैं हे भारत माता! क्या गिनाऊं ज़ख्म कितने हैं जो गहरे हैं कुछ को पता नहीं, क्या बोल गए फिजाओं में विष घोल ग‌ए कुछ खूंटे में बंधे -बंधे भूल गए अपनी भाषा भी सच्चाई औ नैतिकता की परिभाषा भी कहां गया उदार चरित्र कहां ग‌ए उदात्त भाव कौड़ी के मोल में बिक रहे इतना भी तो नहीं अभाव ऊंचे सपने देखते-देखते हम कितने बौने हो ग‌ए यह मिट्टी ही है सब कुछ पगले! मत इसका तू तिरस्कार करो यह बची रहेगी,तभी बचोगे इसका भी विचार करो।
बौद्धिकता ********* कुछ लोग गाल बजा रहे थे कुछ ने साध ली थी चुप्पी एक बौद्धिक गुंगों की गोष्ठी में बौद्धिकता से आतंकित कर रहा था तभी रामजी बाबा जोर से चिल्लाए- "बड़ पढ़ुआ से बड़ भड़ुआ।"
बाधा- दौड़ ********* फरियादी और हाकिम के बीच महज टेबल भर का फासला था। मिलना बहुत जरूरी था वक्त की नजाकत को समझते हुए उसने बाधाओं को झेलने का मन बना लिया था कान सुनने के अभ्यस्त-अभिशप्त हो गये थे- साहब मीटिंग में बिजी हैं जरुरी काम से दौरे पर हैं संचिकाओं में डुबे हुए हैं आज मूड बहुत गरम है (ए.सी.में बैठने के बावजूद) और दरवाजे छेंक कर बैठा वह निजी सहायक पुरानी फिल्मों का क्रूर खलनायक! काफी जद्दोजहद के बाद कुछ पाबंदियां रखीं ग‌ईं कविताओं में बात नहीं रखनी है कार्यालय की भाषा का इस्तेमाल हो अनुरोध करें, शिकायत बिल्कुल नहीं नियम का हवाला दे नहीं सकते फरियादी दर्द से कराह रहा था उसकी आवाज गायब हो गई वह गिरते-गिरते बचा मुंसिफ की कुर्सी पर मुजरिम बैठा था।