कुछ विचार करो
*************
कुछ गूंगे हैं
कुछ बहरे हैं
कुछ विष-वमन करते निरंतर
कहीं अभिव्यक्ति पर भी पहरे हैं
हे भारत माता! क्या गिनाऊं
ज़ख्म कितने हैं जो गहरे हैं
कुछ को पता नहीं, क्या बोल गए
फिजाओं में विष घोल गए
कुछ खूंटे में बंधे -बंधे
भूल गए अपनी भाषा भी
सच्चाई औ नैतिकता की परिभाषा भी
कहां गया उदार चरित्र
कहां गए उदात्त भाव
कौड़ी के मोल में बिक रहे
इतना भी तो नहीं अभाव
ऊंचे सपने देखते-देखते
हम कितने बौने हो गए
यह मिट्टी ही है सब कुछ पगले!
मत इसका तू तिरस्कार करो
यह बची रहेगी,तभी बचोगे
इसका भी विचार करो।
*************
कुछ गूंगे हैं
कुछ बहरे हैं
कुछ विष-वमन करते निरंतर
कहीं अभिव्यक्ति पर भी पहरे हैं
हे भारत माता! क्या गिनाऊं
ज़ख्म कितने हैं जो गहरे हैं
कुछ को पता नहीं, क्या बोल गए
फिजाओं में विष घोल गए
कुछ खूंटे में बंधे -बंधे
भूल गए अपनी भाषा भी
सच्चाई औ नैतिकता की परिभाषा भी
कहां गया उदार चरित्र
कहां गए उदात्त भाव
कौड़ी के मोल में बिक रहे
इतना भी तो नहीं अभाव
ऊंचे सपने देखते-देखते
हम कितने बौने हो गए
यह मिट्टी ही है सब कुछ पगले!
मत इसका तू तिरस्कार करो
यह बची रहेगी,तभी बचोगे
इसका भी विचार करो।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें