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दुनिया डिजिटल है
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कौड़ी,आना,पाई
सबका हिसाब रखते थे भाई
पैसे के हिसाब-किताब से नाखुश
भाइयों ने कर लिया बंटवारा
चंद रुपये के लिए
टूट गयी बरसों की दोस्ती
पैसों के खेल में मगन लोगों को देखकर
कबीर ने दुनिया को घोषित कर दिया बाजार।

कैशबैक के चक्कर में हमने
मोबाइल में लोड कर रखे हैं अनेक एप्प।

आॅफर तय करते हैं
क्या खाना है मुझे आज
क्या पहनना है कल
और पढ़ना भी क्या है
हद है ,यकीन मानिए भाई साहब!
बाल्टी के लोभ में प्रोफेसर साहब ने
बदल दिया है अपना पसंदीदा अखबार
अब पेपर पढ़ने के बजाय
लोग कुपन काटकर जमा करने लगे हैं।

बगल के कमरे में आसीन श्रीमती जी से
श्रीमान कर रहे हैं ह्वाट्सएप पर संवाद
आ रहे हैं संबंधों के
नित नए डिजिटल संस्करण
और कितने दूं उदाहरण
और रखूं कितने उद्धहरण
इस तरह हो रहा है सभ्यताओं का चीरहरण

गाल पर दोनों हाथ रख कर
घण्टे भर से सोच रही है मुनिया
इतनी डिजिटल क्यों हो गयी दुनिया?
                                                        - ललन चतुर्वेदी ek

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हमें समझ जाना चाहिए था  -------------------------------- इच्छा थी कि दो क़दम आगे बढ़कर करूं स्वागत  पर वे अनदेखा कर बगल से निकल ग‌ए मैंने उनकी व्यस्तता समझी  वे चले गए और मैं उन्हें रोज याद करता रहा मैंने उन्हें चिट्ठियां लिखी  संदेश भेजा मैसेंजर पर  सोचा, ह्वाट्सएप से भेजकर देखूं  वह भी किया  सब कुछ लाजवाब रहा  बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा  वे तो बड़े अच्छे आदमी हैं  मामूली लोगों के लिए खूब लिखते हैं  फिर एक मामूली आदमी कैसे रह गया अलक्षित  मुझे तो बहुत पहले समझ जाना चाहिए था मामूली आदमी के लिए लिखने वाले  मामूली आदमी की लड़ाई कभी नहीं लड़ते  सचमुच वे कोई मामूली आदमी नहीं है  यह हमें बहुत पहले समझ जाना चाहिए था। @ ललन चतुर्वेदी
बिना पूंजी के रोजगार ***************** आलीशान, ऊंचे महल में चींटियां  छिद्र ढूंढ़ती हैं एक नौसिखुआ आलोचक उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है कोई कुटिल,कुपाठी हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला नखों से नाव में छेद बनाता है कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर आकाश पर जोर से थूकता है बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
बात जो सबसे जरुरी है ****************** कुछ बातें पूछी नहीं जातीं कुछ बातें कही नहीं जाती सिर्फ महसूस की जाती हैं जरा सा भी चूक हुई  कि नष्ट हो जाती है मर्यादा मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता इसलिए जो बात पूछी न जाए उसे जरूर पूरी की जाए और जो बात कही न जाए उसे ध्यान से सुना जाए ध्यान रहे जो बातें सबसे जरुरी होती हैं उन्हें कहना-सुनना जरूरी नहीं होता।