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मैं ऐसे समय में इस प्लेटफार्म पर उपस्थित हो रहा हूं,जब पूरा विश्व कोरोना वायरस से त्रस्त है।सबकी आशा भरी निगाहें भारत पर टिकी हुई है।महामारी संकट अपनी जगह है लेकिन एक और संकट जो सदियों से है और आपदा में यह और गहरा जाता है,वह है - सत्य नहीं बौलने का संकट। सत्य नहीं बोलना-असत्य को शीश झुकाकर स्वीकार करना है। निश्चित रूप से अभिव्यक्ति के खतरे हैं और हर युग में रहे हैं लेकिन हमें खतरा मोल लेना होगा। बुद्धिजीवी जन का मौन सालता है।इसी प्रकार अर्ध सत्य भी बड़ा खतरनाक होता है। हम इस मंच पर अपनी कविताओं एवं अन्य रचनात्मक गतिविधियों के साथ उपस्थित होते रहेंगे।भूल - त्रुटि के लिए अग्रिम क्षमा याचना सहित दो कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं--

तीन आदमी
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एक आदमी
इस धरती का वंदन करता है
धूल से चन्दन करता है

दूसरा आदमी
अपनी हरकतों से कब चूकता है
इस धरती पर थूकता है

एक तीसरा आदमी भी है
जो इसी थूक से अपना सत्तू सानता  है
उसे कौन नहीं जानता है?
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रिसर्च-2019
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जो पढ़ा
जहां तक पढ़ा
सब सच पढ़ा

जब बोला
जहां भी बोला
सब झूठ बोला

पढने - लिखने का
सही मतलब समझा
समझा बुरा-भला
अपने तमाम शोधों
से यही निष्कर्ष निकाला
सच बोलना -बुरी बला
झूठ बोलना -ललित कला
झुठ बोलना   -एक प्रतिभा
कौन पूजित,कौन समादृत-
झूठ की आदमकद प्रतिमा। 

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हमें समझ जाना चाहिए था  -------------------------------- इच्छा थी कि दो क़दम आगे बढ़कर करूं स्वागत  पर वे अनदेखा कर बगल से निकल ग‌ए मैंने उनकी व्यस्तता समझी  वे चले गए और मैं उन्हें रोज याद करता रहा मैंने उन्हें चिट्ठियां लिखी  संदेश भेजा मैसेंजर पर  सोचा, ह्वाट्सएप से भेजकर देखूं  वह भी किया  सब कुछ लाजवाब रहा  बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा  वे तो बड़े अच्छे आदमी हैं  मामूली लोगों के लिए खूब लिखते हैं  फिर एक मामूली आदमी कैसे रह गया अलक्षित  मुझे तो बहुत पहले समझ जाना चाहिए था मामूली आदमी के लिए लिखने वाले  मामूली आदमी की लड़ाई कभी नहीं लड़ते  सचमुच वे कोई मामूली आदमी नहीं है  यह हमें बहुत पहले समझ जाना चाहिए था। @ ललन चतुर्वेदी
बिना पूंजी के रोजगार ***************** आलीशान, ऊंचे महल में चींटियां  छिद्र ढूंढ़ती हैं एक नौसिखुआ आलोचक उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है कोई कुटिल,कुपाठी हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला नखों से नाव में छेद बनाता है कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर आकाश पर जोर से थूकता है बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
बात जो सबसे जरुरी है ****************** कुछ बातें पूछी नहीं जातीं कुछ बातें कही नहीं जाती सिर्फ महसूस की जाती हैं जरा सा भी चूक हुई  कि नष्ट हो जाती है मर्यादा मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता इसलिए जो बात पूछी न जाए उसे जरूर पूरी की जाए और जो बात कही न जाए उसे ध्यान से सुना जाए ध्यान रहे जो बातें सबसे जरुरी होती हैं उन्हें कहना-सुनना जरूरी नहीं होता।