बोल (कविता)
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कितने अनमोल हैं वे बोल
जो बोले गये सदियों पूर्व
पर जीवित हैं आज भी
कल भी जीवित रहेंगे
जब तक धरा रहेगी
गुंजते रहेंगे एक कान से
दूसरे कान तक
घोलते रहेंगे अमृत
दिखलाते रहेंगे रास्ता
बंधाते रहेंगे ढाढ़स
टुटने नहीं देंगे धैर्य
वे कैसे उदार लोग थे
जिन्हें छू नहीं पायी यश- लिप्सा
अपना लघु नाम तक नहीं जोड़ा
अपने अनमोल पदों में कहीं भी
सदियों पूर्व कुछ कहकर चले गए
हम सुनते-सुनाते रहेंगे सदियों तक
सच पूछो तो ऐसी रचनाएं ही
कालजयी होती हैं जो
युगों-युगों तक जलती रहती हैं मशाल की तरह
रचना जब अतिक्रमण कर जाती है रचयिता का
और करने लगती है लोक- जिह्वा की सवारी
तब वह सुरसरि बन जाती है
कवि और कविता में कोई भेद नहीं रह जाता।
ललन चतुर्वेदी, बेंगलुरु
==== = 25/12/2018=====
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कितने अनमोल हैं वे बोल
जो बोले गये सदियों पूर्व
पर जीवित हैं आज भी
कल भी जीवित रहेंगे
जब तक धरा रहेगी
गुंजते रहेंगे एक कान से
दूसरे कान तक
घोलते रहेंगे अमृत
दिखलाते रहेंगे रास्ता
बंधाते रहेंगे ढाढ़स
टुटने नहीं देंगे धैर्य
वे कैसे उदार लोग थे
जिन्हें छू नहीं पायी यश- लिप्सा
अपना लघु नाम तक नहीं जोड़ा
अपने अनमोल पदों में कहीं भी
सदियों पूर्व कुछ कहकर चले गए
हम सुनते-सुनाते रहेंगे सदियों तक
सच पूछो तो ऐसी रचनाएं ही
कालजयी होती हैं जो
युगों-युगों तक जलती रहती हैं मशाल की तरह
रचना जब अतिक्रमण कर जाती है रचयिता का
और करने लगती है लोक- जिह्वा की सवारी
तब वह सुरसरि बन जाती है
कवि और कविता में कोई भेद नहीं रह जाता।
ललन चतुर्वेदी, बेंगलुरु
==== = 25/12/2018=====
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