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पिता रोए नहीं कभी
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जिनकी छत्र-छाया में पल रहे थे
पांच बहनें,दो भाई और बूढ़ी मां
पिता ऐसे छतनार पेड़ थे।
थी पड़ोसियों की स्वार्थी मंडली
शामिल थे गांव-जवार के लोग
दोस्त से लेकर दुश्मन भी कई
जिन्हें अलगाना मुश्किल था।

जरुरत के हिसाब से
सेठ-साहूकार को भी साथ लेना जरूरी था
मौका-मुनासिब ये काम आते थे
पिता देर-सवेर जिनके कर्ज चुकाते थे
करते थे ये कड़ा तगादा
पर पिता के सामने
नरम पड़ जाते थे इनके तेवर
एकाध कप चाय पीकर
और दो-तीन बार खाकर खैनी
अगले महीने बकाया पा लेने
के आश्वासन के साथ
लौट जाते थे खुशी- खुशी।

पिता को मालूम था
कैसे कठोर लोगों से निबटा जाता है
कैसे काटा जाता है
फाकाकशी के दिन
कैसे काटी जाती हैं
टपकती हुई झोंपड़ी में
सावन-भादो की काली रातें
वक्त की नजाकत के मुताबिक
किससे कैसे की जाती हैं बातें।

पिता हर वार के कवच थे
पिता उम्मीद की किरण थे
पिता खाली थे, फिर भी भरे-पूरे थे
पिता की अनुपस्थिति में
हम सब होते अधूरे थे।

पिता पूरा समय
दोस्त-दुश्मन सबके करीब रहे
कभी किसी को पता नहीं चला
कब अमीर रहे,कब गरीब रहे
पिता पूरा जीवन
कर्ज चुकाते रहे, फर्ज निभाते रहे
पिता रोए नहीं कभी
हमारे बीच हरदम
हंसते रहे, मुस्कुराते रहे।

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