जिंदगी
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माना कि कोई अदृश्य शक्ति
करती रहती है निर्देशन
पर जिन्दगी की पटकथा
खुद लिखता है इंसान
व्यर्थ है किसी को दोष देना
व्यर्थ है किये पर पछतावा
लिख चुकने के बाद
नहीं है मिटाने का विकल्प
न ही है सिर धुनने का कोई लाभ
दंड अवश्यसंभावी है उसका
जो किया जा चुका अपराध
होम करते हुए भी जला करता है हाथ
खड़े हो थामकर मजबूती से
जिस प्रिय का हाथ
अचरज नहीं ऐन वक्त पर
चल दे वह भी झटककर हाथ
उठा करता है पूनम को देखकर
विशाल उदधि में जो ज्वार
क्षण भर में ही हो जाता उसका अवसान
हर सृजन के पार्श्व में
पांव दबाये टहलता रहता है दुःख
दुर्दिन में आ खड़ा होता है सम्मुख
जीवन घात -प्रतिघात का संघात
लगता है सब कुछ आकस्मिक-अकस्मात
सुख स्वप्न है, दुःख है सत्य
कब समझा यह नर मर्त्य
कितना सही लिखा महादेवी ने-
जीवन है विरह का जलजात l
ललन चतुर्वेदी, बेंगलुरु।
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