मन
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ललन चतुर्वेदी
चाहता है नाप लें पूरे गगन को
फिर थोड़ी देर में थक जाता है
कभी करने लगता किसी से बेशुमार प्रेम
कभी घृणा से भर उठता है
जिस द्वार से दुत्कार कर भगाया जाता है
उसकी देहरी पर नाक रगड़ता है बार-बार
कैसे कहा जाए कि यह मजबूत है
सच है कितना मजबूर है !
नाचता रहता है परिस्थितियों की लय-ताल पर
मन सचमुच नटवर है,मन पक्षी है
उछल-कूद करता है डाल-डाल पर
जरूरी है कि रखा जाए इसे संभाल कर
कहते हैं विज्ञजन- मन के हारे हार है मन के जीते जीत
पर मन करता है हमें बार-बार भयभीत
क्यों मन का नहीं होने पर
होती है तकलीफ
मन इतना नटखट है कि
सुनता भी नहीं कभी सीख
मन जीवन के चलचित्र का निर्देशक है
जो किसी को हीरो, किसी को विलेन बनाता है।
कोई ज्ञानी भी इसकी पटकथा समझ नहीं पाता है
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ललन चतुर्वेदी
चाहता है नाप लें पूरे गगन को
फिर थोड़ी देर में थक जाता है
कभी करने लगता किसी से बेशुमार प्रेम
कभी घृणा से भर उठता है
जिस द्वार से दुत्कार कर भगाया जाता है
उसकी देहरी पर नाक रगड़ता है बार-बार
कैसे कहा जाए कि यह मजबूत है
सच है कितना मजबूर है !
नाचता रहता है परिस्थितियों की लय-ताल पर
मन सचमुच नटवर है,मन पक्षी है
उछल-कूद करता है डाल-डाल पर
जरूरी है कि रखा जाए इसे संभाल कर
कहते हैं विज्ञजन- मन के हारे हार है मन के जीते जीत
पर मन करता है हमें बार-बार भयभीत
क्यों मन का नहीं होने पर
होती है तकलीफ
मन इतना नटखट है कि
सुनता भी नहीं कभी सीख
मन जीवन के चलचित्र का निर्देशक है
जो किसी को हीरो, किसी को विलेन बनाता है।
कोई ज्ञानी भी इसकी पटकथा समझ नहीं पाता है
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