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शब्द बार-बार लौटते हैं
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जिन ध्वनियों को मुक्त कर
देते हो अपने दिल को तसल्ली
अपने को हल्का महसूस करते हो
वे नहीं लौटते तुम्हारे पास।
पर इनकी प्रतिध्वनियां
गुंजती रहती हैं उन कानों में
जिनके लिए करते हो इनका प्रयोग
जिम्मेदार व्यक्तियों के शब्द तो
उद्धृत होते हैं बार-बार
कुछ शब्द तो दर्ज हो जाते हैं इतिहास में
साक्षी है समय
शब्द पुरस्कृत किये जाते हैं
शब्द करते हैं मरहम का काम
जो नहीं समझते शब्द का मर्म
गाहे-बगाहे चलाते रहते हैं शब्दभेदी बाण
भले ही वापस नहीं लौटे श्रवण कुमार
पर उसके माता-पिता के
कातर शब्दों की प्रतिध्वनियां
गुंजती हैं जनमानस में बार-बार
हो न जाए कोई अनर्थ, अनाचार
इसलिए शब्दों को मुक्त करने के पहले
कवि करता है बहुत सोच-विचार।






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हमें समझ जाना चाहिए था  -------------------------------- इच्छा थी कि दो क़दम आगे बढ़कर करूं स्वागत  पर वे अनदेखा कर बगल से निकल ग‌ए मैंने उनकी व्यस्तता समझी  वे चले गए और मैं उन्हें रोज याद करता रहा मैंने उन्हें चिट्ठियां लिखी  संदेश भेजा मैसेंजर पर  सोचा, ह्वाट्सएप से भेजकर देखूं  वह भी किया  सब कुछ लाजवाब रहा  बहुत दिनों तक मैं सोचता रहा  वे तो बड़े अच्छे आदमी हैं  मामूली लोगों के लिए खूब लिखते हैं  फिर एक मामूली आदमी कैसे रह गया अलक्षित  मुझे तो बहुत पहले समझ जाना चाहिए था मामूली आदमी के लिए लिखने वाले  मामूली आदमी की लड़ाई कभी नहीं लड़ते  सचमुच वे कोई मामूली आदमी नहीं है  यह हमें बहुत पहले समझ जाना चाहिए था। @ ललन चतुर्वेदी
बिना पूंजी के रोजगार ***************** आलीशान, ऊंचे महल में चींटियां  छिद्र ढूंढ़ती हैं एक नौसिखुआ आलोचक उत्तम कलाकृति की खामियां गिनाता है कोई कुटिल,कुपाठी हर प्रसंग में अपना टांग अड़ाता है नौका में सवार मुफ्तखोर, निठल्ला नखों से नाव में छेद बनाता है कोई दुस्साहसी मुंह ऊपर उठाकर आकाश पर जोर से थूकता है बिना पूंजी के इतने सारे रोजगार हैं यहां मंदबुद्धि मंदी पर मगजमारी कर रहे हैं।
बात जो सबसे जरुरी है ****************** कुछ बातें पूछी नहीं जातीं कुछ बातें कही नहीं जाती सिर्फ महसूस की जाती हैं जरा सा भी चूक हुई  कि नष्ट हो जाती है मर्यादा मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता इसलिए जो बात पूछी न जाए उसे जरूर पूरी की जाए और जो बात कही न जाए उसे ध्यान से सुना जाए ध्यान रहे जो बातें सबसे जरुरी होती हैं उन्हें कहना-सुनना जरूरी नहीं होता।