कविता-३,
इस बस्ती में मेरी क्या हस्ती है
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अमीरों ने जीना मुहाल कर दिया है
एक-एक कर सारी बस्ती को कंगाल कर दिया है
यह उसके कुते के भौंकने की आवाज से
भंग हो रही है मेरे कविता की लय
सड़कों पर श्वान को टहलाने निकल पड़ी है सुंदरी
और होने लगा है मुझे भय
मैंने टहलना स्थगित कर दिया है
जब तक दासियां उसके घरों को धोयेंगी
और बनायेंगी मुख्य- द्वार पर रंगोली
तब तक श्वान सड़क पर
नित्य क्रिया से निबट लेंगे
सचमुच बड़ी सहनशील होती हैं सड़कें
बिल्कुल गरीब आदमी की तरह।
यह मंदिर का पुजारी
अहले सुबह रोज अपने को सबसे बड़ा भक्त घोषित करता है
मेरी बीमार देह के साथ-साथ
कराह उठती है आत्मा
यह पड़ोसी तो जन्म- जन्म का है प्यासा
अपने शक्तिशाली मोटर से सोख लेता है कावेरी का पूरा जल
मैं अपने भलेमानस होने का क्या प्रमाण दूं
और आप क्यों विश्वास करेंगे
फ़िक्र मत करे कोई मेरी
मैं जानता हूं
इस बस्ती में रहने की मेरी हस्ती नहीं है।
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