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जीवन्त जीवन

जन्मऔर मृत्यु के दो छोरों तक
नहीं सिमटा होता है जीवन

पिता के नाम से जाना जाता है पुत्र
और पुत्र के नाम से भी कभी-कभी
पहचाने जाते हैं पिता-पितामह
कभी -  कभी जीवन लांघ जाता है
सदियों का अछोर विस्तार

जीवन का अर्थ शतायु होना नहीं है
यह तो बंध जाना है सीमाओं में
जीवन तब सफल होता है
जब कर देता है मृत्यु का अतिक्रमण

असंख्य लोग आते हैं दुनिया में
अपना जीवन जी कर चले जाते हैं
सच है ऐसे लोग मर जाते हैं
जब भी कोई किसी के जाने के बाद
करे पूरी शिद्दत से याद
और यह याद ला सके
किसी की आंखों में आंसू
आप फिर से जी उठते हैं

यकीन मानिए इस नश्वर काया के
नष्ट हो जाने के बाद मनुष्य
जीवित रहता है अपने विचारों में
ऐसे लोग झुठला देते हैं
मनुष्य के मरणशील होने का मुहावरा।

                                -        ललन चतुर्वेदी

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