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प्रेम-मरीचिका
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आंखें धुंधला गई हैं
पढ़ कर गुड मॉर्निंग,गुड नाईट के संदेश
जो  जानते हैं मेरे अंतर्मन का हाल
वे भी कहां चूकते हैं
उनके ऐसे संदेश गहरे तक चुभते हैं
क्या करेंगे ऐसे समय में लेकर प्यार
जब बन चुकी है पूरी दुनिया बाजार
क्या अर्थ रह गया है प्रेम का
क्या मतलब रह गया है किसी के कुशल-क्षेम का
पास में पैसे हों तो सब सगे दिखते हैं
मतलब के रंग में सब रंगे दिखते हैं
आपकी खुशियों से किसको लेना-देना
पैसे हैं तो सब मीठे बोलते हैं

सब के सब सिर्फ जेब टटोलते हैं
छूंछा को जग में किसने पूछा
सदियों से संत करते रहे हैं आगाह
पर मदमस्त मन कब  करता है परवाह
उसे जो दिखता है आस-पास
कर लेता है सहज विश्वास
खाता है खूब ठोकर
फिर भी बना रहता है जोकर
खुशियों को गिरवी रख देता है
फिर करता है खुशियों की तलाश
यही काम तो सारी उमर करता है
इसी तरह सफर पूरी करता है
जिसकी चिंता में घुलता रहता है
वही उसको धुनता रहता है
लेकिन नहीं छूटता है
प्रेम का अवांछित रोग
कोई समझ नहीं सका आज तक
जीवन और मृग मरीचिका का संयोग।

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